साकिन...
कदम उठते क्यों नहीं?
दिल मचलता क्यों नहीं?
साँसें फूलती क्यों नहीं?
दम भरता क्यों नहीं?
जिंदगी तेरे होनेका एहसास क्यों होकर भी है नहीं?
सिमटसी जाती है हर आरजू उभरनेसे पहले यूँ
मिटसी जाती हो हर लकीर जैसे खीचनेसे पहली ही
उम्मीद लव्ज़ क्यों लगता है अंजनासा?
अपनीही ख्वाहिशोसे रिश्ता लगे बेगानासा?
हो रौशनी या हो अँधेरा, है अब परवाह किसे?
इंतज़ार किसी अनदेखे आफ़ताब का अब है कहाँ?
खुश्क आहों का साथ गर रहे यूँ ही,
यह सफर भी कट जाएगा, पलक झपकनेकी देरी है बस...
कदम उठते क्यों नहीं?
दिल मचलता क्यों नहीं?
साँसें फूलती क्यों नहीं?
दम भरता क्यों नहीं?
जिंदगी तेरे होनेका एहसास क्यों होकर भी है नहीं?
सिमटसी जाती है हर आरजू उभरनेसे पहले यूँ
मिटसी जाती हो हर लकीर जैसे खीचनेसे पहली ही
उम्मीद लव्ज़ क्यों लगता है अंजनासा?
अपनीही ख्वाहिशोसे रिश्ता लगे बेगानासा?
हो रौशनी या हो अँधेरा, है अब परवाह किसे?
इंतज़ार किसी अनदेखे आफ़ताब का अब है कहाँ?
खुश्क आहों का साथ गर रहे यूँ ही,
यह सफर भी कट जाएगा, पलक झपकनेकी देरी है बस...